जंतर-मंतर, वेधशाला
उज्जैन शहर में दक्षिण की ओर क्षिप्रा के दाहिनी तरफ जयसिंहपुरा नामक स्थान में बना यह प्रेक्षा गृह जंतर महल के नाम से जाना जाता है। इसे जयपुर के महाराजा जयसिंह ने सन् 1733 ई.में बनवाया। उन दिनों वे मालवा के प्रशासन नियुक्त हुए थे। जैसा कि भारत के खगोलशास्त्री तथा भूगोलवेत्ता यह मानते आये हैं कि देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है। अतः यहाँ के प्रेक्षागृह का भी विशेष महत्व रहा है।
यहाँ पाँच यंत्र लगाये गये हैं
भिŸिा यंत्र:- सम्राट यंत्र, नाडी वलय यंत्र, दिगंश यंत्र, भिŸिा यंत्र एवं शंकु यंत्र है। इन यंत्रों का सन् 1925 में महाराजा माधवराव सिंधिया ने मरम्मत करवाया था। यह वैधशाला पाँच शहरों दिल्ली, जयपुर, मथुरा, वाराणसी एवं उज्जैन में बनवाई गई वैधशालाओं में से एक उत्कृष्ट वेधशाला है। उज्जैन को प्राचीन भारत का ग्रीनविच के नाम से जानते है। आज भी इस वेधशाला का उपयोग पंचांग बनाने में किया जाता है। सूर्य घड़ी से प्राप्त स्थानीय समय को वहीं लगी एक सारणी से स्टैण्डर्ड समय में बदल दिया जाता है।
दिगंश यंत्र:- दिगंश यंत्र से ग्रह-नक्षत्रों के दिगंश प्राप्त किए जाते है। यह वेधशाला पंचांग के साथ-साथ प्राचीन कलाकृति का भी ज्ञान प्रदान करती है। यह एक उŸाम स्थाल है। वेधशाला में टेलिस्कोप भी उपलब्ध है। यहा टेलिस्कोप के माध्यम से रात्रि के समय आकाश अवलोकन की सुविधा पर्यटकों के लिए उपलब्ध है। ग्रहण आदि विशेष घटनाओं का टेलिस्कोप के माध्यम से अवलोकन वेधशाला में करवाया जाता है। सोलर फिल्टर वाले टेलिस्कोप से दिन के समय सूर्य और उसके धब्बों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यहीं से एक छोटी सी पुस्तिका जिसका मूल्य सिर्फ पाँच रुपये था, हमने खरीदी और सभी यंत्रों की जानकारी इसी से देखकर लिख रहा हूँ। काफी कठिन शब्दावली है इसलिए अनजाने में हुई त्रूटि के लिए पहले से क्षमा मांग लेता हूँ।
सम्राट यंत्र:- इस यंत्र के बीच की सीढि़ की दीवारों को ऊपरी सतह पृथ्वी की धुरी े समानांतर होने के कारण रात को दीवारों की ऊपरी सतह की सीध में ध््राुव तारा दिखाई देता है। सीढि़ की दीवारों के पूर्व और पश्चिम दिशा में समय बतलाने के लिए एक चैथाई गोल भाग बना हुआ है। जिस पर घंटे, मिनट और मिनट का तीसरा भाग खुदे हुए हैं। जब आकाश में सूर्य चमकता है तब दीवार की छाया पूर्व या पश्चिम दिशा में लगी समय सारणी के अनुसार मिनट, इस उज्जैन समय में जोड़ने से भारतीय मानक समय ज्ञात होता है।
नाड़ी वलय यंत्र:- धरातल में निर्मित इस यंत्र के उŸार दक्षिण में दो भाग हैं। छह माह जब सूर्य उतरी गोलार्द्ध में रहता है, उŸार का गोल भाग प्रकाशित रहता है तथा दूसरे छह माह जब सूर्य दक्षिण गोलार्द्ध में रहता है, दक्षिण का गोल भाग प्रकाशित रहता है-यानि कि सूर्य की धूप इस पर पड़ती है। इन दोनों भागों के बीच में पृथ्वी की धुरी के समानांतर लगी कीलों से उज्जैन का स्थानीय समय ज्ञात होता है। गृह व नक्षत्र की उŸारी व दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थिति जानने के लिए भी इस यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है।
शंकु यंत्र:- क्षितिज वृŸा के धरातल में निर्मित इस चबूतरे के मध्य में एक शंकु लगा हुआ है जिसकी छाया से सात रेखाएं खींची गयी है जो बारह राशियों को प्रदर्शित करती हैं। वे रेखाएं 22 दिसंबर को वर्ष का सबसे छोटा दिन 21 मार्च एवं 23 सितम्बर दिन रात बराबर तथा 22 जून को वर्ष का सबसे बड़ा दिन बतलाती हैं। शंकु की छाया से उन्नतांश भी ज्ञात किये जा सकते हैं। शंकु की छाया दिन की अवधि के घटने-बढने के साथ घटती बढ़ती रहती है जिससे ये रेखाएं बनी हुई हैं।
